धान की ग्रोथ रुक गई हो तो करें ये उपाय

धान की ग्रोथ रुक गई हो तो करें ये उपाय


जहां भी धान की ग्रोथ नहीं हो रही है किसान प्रति एकड़ ढाई किलोग्राम यूरिया और आधा किलोग्राम जिंक को मिलाकर 100 लीटर पानी से स्प्रे कर दें


धान में बौनपन की समस्या को दूर करने के वैज्ञानिक उपाय 


इस बार मानसून की अनियमिता और कम बारिश के कारण कई जगह खरीफ की फसलों को नुकसान पहुंचा है। इसमें सबसे अधिक नुकसान धान की फसल को हुआ है। इससे ये अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार खरीफ फसलों के उत्पादन में कमी आ सकती है। इसी बीच कुछ राज्यों से खबरें आ रही है कि धान में बौनपन की बीमारी लग गई है। धान में बौनेपन की बीमारी का मतलब है कि धान के दाने की ठीक से बढ़वार नहीं हो पा रही है। ऐसे में किसान चिंतित हैं कि यदि ऐसा हुआ तो इस बार उन्हें धान की कम पैदावार मिलेगी और धान का छोटा दाना होने से इसके बाजार में भाव भी अच्छे नहीं मिल पाएंगे। किसानों की इस समस्या को लेकर कृषि वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया और उनकी इस समस्या के समाधान के लिए कुछ उपाय सुझाएं हैं।

क्या है धान मेें बौनेपन की बीमारी


पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने पंजाब के कई हिस्सों में धान के पौधों के बौनेपन के पीछे सदन राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस का एक वायरल रोग पाया है। इस वायरस के कारण धान के पौधों की बढ़वार रुकना बताया जा रहा है। एसआरबीएसडीवी के कारण हुई इस बीमारी को पहली बार 2001 में दक्षिणी चीन से रिपोर्ट किया गया था, लेकिन यह पहली बार है जब इसे पंजाब में पाया गया है। लुधियाना स्थित पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कुलपति सतबीर सिंह गोसल ने कहा है कि धान के पौधे बौनेपन के पीछे असली कारण एसआरबीएसडीवी है।

इन जगहों से मिली धान में बौनेपन की बीमारी


पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को किसानों की ओर से धान के पौधे छोटे रहने की शिकायतें मिल रही थी। धान में बौनेपन के लक्षणों के होने की शुरुआती रिपोर्ट श्री फतेहगढ़ साहिब, पटियाला, होशियारपुर, लुधियाना, पठानकोट, एसएएस नगर और गुरदासपुर जिलों से प्राप्त हुई थी, इसके एक महीने के बाद  करीब पूरे पंजाब और उसके आसपास के राज्यों में धान के पौधों में इस प्रकार के लक्षण देखे जा रहे हैं।

बौनेपन की बीमारी से धान के पौधों में दिखाई दे रहे हैं ये लक्षण



  • इस बीमारी से संक्रमित पौधे अविकसित रह रहे हैं और इनकी ऊंचाई समान्य के मुकाबले एक तिहाई रह जाती है।

  • पौधों की जड़ें और अंकुर दोनों बुरी तरह प्रभावित हो जाते हैं।

  • कुछ गंभीर रूप से संक्रमित पौधे मुरझाते हुए भी दिखाई दिए हैं। इन पौधों की जड़ें गहराई तक नहीं जाती और इन्हें आसानी से उखाड़ा जा सकता है ।

  • रिपोर्ट के अनुसार करीब सभी धान की किस्मों में यह रोग पाया जा रहा है।


धान की इन किस्मों में पाए गए हैं बौनेपन के लक्षण


डॉ. ए.के. सिंह, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) ने साझा किया कि आईएआरआई-पूसा संस्थान के विशेषज्ञों की एक टीम प्रभावित क्षेत्र से प्रभावित पौधों के नमूने एकत्र करने के लिए मैदान पर है। इस स्थिति को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए कृषि मंत्रालय द्वारा एक समिति का गठन किया गया है। प्रमुख किस्में जिनमें बौनापन बताया गया है वे हैं पीआर-126, पीआर-121, पीआर-114, पूसा बासमती 1509, पूसा बासमती 1692, पूसा बासमती 1401 हैं।

इस कारण हो सकती है धान के पौधों में बौनपन की बीमारी


उन्होंने बताया कि धान के पौधे में बौनापन के लक्षण ग्रासी स्टंट वायरस और सदर्न राइस ड्वार्फ स्ट्रीक वायरस के समान दिख रहे हैं। एक अन्य संभावना जिसके परिणामस्वरूप समान लक्षण होते हैं, वह है फाइटोप्लाज्मा रोग; और फुसैरियम जो बकाने रोग का कारण बनता है जिसमें पौधा बहुत लंबा हो जाता है और सूख जाता है लेकिन पौधों की वृद्धि को भी कम कर सकता है और वे अविकसित रह जाते हैं

बौनपन की बीमारी से सिर्फ 5 से 15 प्रतिशत ही पौधे प्रभावित


कृषि वैज्ञानिकों की टीम द्वारा किए गए सर्वे के मुताबिक जिन धान के खेतों में बौनापन देखा गया है, वहां करीब 5-15 प्रतिशत पौधों की आबादी प्रभावित हुई है। यह समस्या हर क्षेत्र में नहीं बल्कि कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में ही देखी गई है। बौने पौधे करीब 1 फीट लंबे हैं और इन्हें आसानी से खेत से उखाड़ा जा सकता है और जड़ों में कालापन देखा गया है। इसके परिणामस्वरूप ये माना जा सकता है कि पौधे को कम पोषण की आपूर्ति भी हुई है।

किसान करें खेत की निगरानी


अभी कृषि वैज्ञानिक ये पता नहीं लगा पाए हैं कि ये बीमारी आखिर आई कहां से और इसका उपचार क्या है। इसलिए फिलहाल उन्होंने किसानों को खेतों की निगरानी करने को कहा है। इसके लिए खेत में कुछ पौधों को थोड़ा टेढ़ा करके 2-3 बार टैप करना चाहिए। यदि होपर बच्चे या वयस्क आदि किसी भी अवस्था में मौजूद हैं, तो पानी पर तैरते हुए दिखाई दे जाएंगे। अगर ऐसा होता है तो तुरंत कीटनाशक स्प्रे करना चाहिए।

इन दवाओं का करें छिडक़ाव


वैज्ञानिकों द्वारा जारी एडवाइजरी के मुताबिक यदि खेत में व्हाइट बैक्ड प्लांट हॉपर की मौजूदगी दिखाई देती है तो उससे बचाव के लिए पैक्सोलैम 10 एससी (ट्राइफ्लूमेजोपाइरिन) 235 मिली प्रति हेक्टेयर या ओशीन टोकेन 20एसजी (डाइनोटेफरॉन) 200 ग्राम प्रति हेक्टेयर या चेस 50 डब्ल्यू जी (पाइमेट्रोजीन) 300 ग्राम प्रति हेक्टेयर का छिडक़ाव करें। बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए पौधे की आधार में ही दवा का छिडक़ाव करें

किसान ऐसे करें संक्रमित पौधे की पहचान


एडवाइजरी में कहा गया है कि धान की रोपाई के बाद शुरुआती दौर में ही रोग से संक्रमित पौधों की पहचान कर लें। संक्रमित पौधे शुरुआती दौर में ही पीले हो जाते हैं। इस तरह से उनकी पहचान किसान कर सकते हैं। खेत में अगर संक्रमण की दर पांच से 20 फीसदी के बीच है तो रोगग्रस्त पौधे को उखाड़ कर बाहर फेंक दें और फिर उनके जगह पर नए और स्वस्थ पौधे लगा दें

बौनपन रोग की रोकथाम के लिए ये करें उपाय


किसानों की इस परेशानी को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने एडवाइजरी जारी की है। एडवाइजरी में कहा गया है कि रोग की रोकथाम के लिए किसान खेत के मेड़ों के पूरी तरह साफ रखें और खेत से खरपतवार को पूरी तरह हटा दें, खरपतवार प्रबंधन और नियंत्रण अच्छी तरह से करें।

स्वस्थ पौधे को सुरक्षित रखने के लिए करें ये उपाय


उन्होंने कहा कि संस्थान अभी भी इस संक्रमण के कारण का पता लगाने के लिए काम कर रहा है लेकिन अभी तक यह वायरस या बैक्टीरिया दोनों हो सकता है। उन्होंने किसानों को ब्राउन प्लांट हॉपर (बीपीएच), व्हाइट बैक प्लांट हॉपर, ग्रीन प्लांट हॉपर के लिए उचित नियंत्रण उपाय करने की सलाह दी है क्योंकि यह रोग को स्वस्थ पौधों तक फैलाने के लिए एक वेक्टर के रूप में कार्य कर सकता है। वहां कीटों को नियंत्रित करने के लिए, उन्होंने पेक्सलॉन (94 मिली, 250 लीटर पानी/एकड़), ओशीन और टोकन (100 ग्राम, 250 लीटर पानी/एकड़), चैस (120 ग्राम, 250 लीटर पानी/एकड़) का उपयोग करने की सलाह दी

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