गेहूं की जैविक खेती से संबंधित कृषि क्रियाएं



गेहूं की जैविक खेती से संबंधित कृषि क्रियाएं







  1. भूमि का चयन और तैयार करना

  2. बिजाई का समय

  3. आकस्मिक प्रणाली

  4. अनुमोदित किस्में

  5. बीज का उपचार

  6. बीज दर और अंतराल

  7. मृदा उर्वरकता प्रबंधन

  8. सिंचाई और पानी

  9. सस्य विधियां और खरपतवार प्रबंधन

  10. अतिरिक्त फसल प्रणाली

  11. फसल की सुरक्षा

  12. रोग प्रबंधन

  13. उपज


गेहूं की उन्नत खेती





भूमि का चयन और तैयार करना


गेहूं की खेती विभिन्न प्रकार की भूमि में की जा सकती है। इसके लिए 6.5-7.8 पीएच रेंज और 1 प्रतिशत से अधिक जैविककार्बन युक्त सुनिकासी व्यवस्था वाली मध्यम दोमट और चिकनी दोमट मृदा उपयुक्त होती है। खेत में पीएच स्तर, जैविक कार्बन, सूक्ष्म पोषक तत्वों (एनपी.के.) और सूक्ष्मजीवों की संख्या की जांच करने के लिए वर्ष में एक बार मृदा की जांच करने की अपेक्षा होती है। यदि जैविक कार्बन का मात्रा 1 प्रतिशत से कम हो तो, 25-30 टन/हैक्टेयर कार्बनिक खाद का प्रयोग करें और खाद को भली भांति मिलाने के लिए खेत की 2-3 बार अच्छी तरह जुताई करें। प्रमाणि जैविक खेतों पर प्रतिबंधित सामग्रियों के प्रवाह को रोकने के लिए प्रमाणित जैविक खेतों और अजैविक खेतों के बीच लगभग 5-7 मीटर की दूरी पर पर्याप्त सुरक्षा पट्टी का प्रबन्ध किया जाए। गेहूं की खेती के लिए भली भांति सूक्ष्म जुताई किंतू छोटी बीज क्यारियां अपेक्षित होती हैं। खरीफ की कटाई के बाद, भूमि की जुताई की जाती है और पाटा अथवा किसी अन्य उपयुक्त जुताई यन्त्र द्वारा मिट्टी के बड़े पिण्डों को तोड़कर एकसमान सिंचाई के लिए खेत को भली भांति समतल बनाया जाता है। हल्के ढाल होने की स्थिति में, परिरेखा खेती विधि का आश्रय लेना चाहिए। हिमाचल प्रदेश में गेहूं की औसतन उपज 15.33 क्विंटल/हैक्टेयर है, जबकि राष्ट्रीय औसत 28. 02 क्विंटल/हैक्टेयर है। गेहूं की कम पैदावार के मुख्य कारण इसकी खेती 83 प्रतिशत बारानी भूमि पर की जा रही है, सुधरी किस्मों की कम भूमि पर खेती, खादों का कम प्रयोग, खरपतवार एवं कीट व बीमारियों का प्रकोप इत्यादि गेहूं की कम उपज का कारण है।

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बिजाई का समय


अच्छी पैदावार लेने के लिए गेहूं की बिजाई सही समय पर करनी चाहिए। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में बिजाई का समय निम्नलिखित है –












































क्षेत्र

 
सिंचित

 
असिंचित
समय से बिजाई
निचले पर्वतीय क्षेत्रअक्तूबर के अंतिम सप्ताह - 15 नवम्बर

 
अक्तूबर के अंतिम सप्ताह15 नवम्बर
मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्र- यथोपरि -

 
- यथोपरि -

 
ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र

 
1 अक्तूबर से 15 अक्तूबर1 अक्तूबर से 15 अक्तूबर
पछेती बिजाई
निचले पर्वतीय क्षेत्रदिसम्बर के अन्त तक

 
वर्षा पर निर्धारित परंतु दिसंबर के अंत तक
मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्र- यथोपरि-- यथोपरि -
ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र15 अक्तूबर तक15 अक्तूबर तक

 

यदि देरी से बिजाई की जाये तो उत्पादन में कमी आ जाती है।

आकस्मिक प्रणाली


यदि कुल्लू घाटी (खण्ड -2) में सर्दियों की बारिश आने में बहुत देरी हो जाये तो गेहूं (VL-892) और गोभी- सरसों (किस्म शीतल) की बिजाई सबसे लाभदायक रहती है। उसके बाद गेहूं (HS-490) की बिजाई जनवरी के पहले पखवाड़े तक कर लेनी चाहिए

और ऐसी स्थिति में बारानी खेती के लिए दी गई नाईट्रोजन की मात्रा की 25 प्रतिशत अधिक मात्रा इन फसलों को देनी चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में मसर (किस्म विपाशा), सरसों (किस्म बी.एस.एच.-1) या राया (किस्म वरूणा) को क्रमशः लगाना चाहिए।

अनुमोदित किस्में

























बिजाईबिजाई का समय

 
अनुमोदित किस्में
अगेतीअक्तूबर 15 तक

 
वी.एल.- 829
समय पर

 
अक्तूबर तीसरे सप्ताह से 15 नवम्बर तकएच.पी.डब्ल्यू.-147

एच.पी.डब्ल्यू.-155

एच.पी.डब्ल्यू.- 249
पछेतीदिसम्बर अंत तक

 
एच.पी.डब्ल्यू.- 42

वी.एल.- 892

 

बीज का उपचार


बीज के उपचार से पूर्व, सुनिश्चित कर लें कि बीज स्वस्थ, आकार में एकसमान और किसी किस्म की कीट क्षति अथवा रोग से मुक्त हों। बीजों को प्रत्येक 10 कि.ग्रा. बीज के लिए पहले बीजामृत और ट्रिकोडर्मा विरदी से क्रमशः 1.5 कि.ग्रा. और 80 ग्राम की दर से संसाधित किया जाता है। फिर से 10 कि.ग्रा. बीजों के लिए प्रत्येक 200 ग्राम एजोटोबैक्टर और पीएसबी जैव उर्वरक के मिश्रण से बीजों को संसाधित करें। बीजों को छाया में सुखाएं और संसाधित करने के 6-8 घण्टे में बुआई करें।

बीज दर और अंतराल


किसान प्रायः छट्टा देकर बीज बोते हैं परंतु इसमें निराई, गुड़ाई में कठिनाई आती है। और पैदावार भ्ज्ञी कम होती है। इसलिए गेहू को 22 सें.मी. कतारों में बोया जाना चाहिए। सही समय की बिजाई के लिए 90-110 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है। लेकिन बारानी क्षेत्रों में 20 दिसम्बर के बाद बिजाई के लिए 150 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर उपयुक्त होता है। बीजों की बुआई 5-7.5 सें.मी. की गहराई पर, अभिमानतः ड्रिलिंग द्वारा अथवा हल के पीछे से की जाती है। सिंचाई की स्थितियों और बुआई के समय के आधार पर बीज की मात्रा और अंतराल भिन्न होता है जो निम्नानुसार है –

वर्षापोषित - अक्तूबर के मध्य से अक्तूबर के अंत तक बुआई, 75-90 कि.ग्रा./है0

सिंचित-15 नवम्बर से 05 दिसम्बर के दौरान बुआई, 90 कि.ग्रा./है0|

विलम्बित सिंचित-5 दिसम्बर से दिसंबर के अंत तक की अवधि के दौरान बुआई, 130-150 कि.ग्रा./है0

वर्षापोषित और सिंचित स्थितियों में पंक्ति दर पंक्ति दूरी 22.5 सें.मी. बनाए रखनी चाहिए। विलंबित बुआई के मामले में, पंक्ति दर पंक्ति से 15-18 सें.मी. तक कम कर देनी चाहिए। वर्षापोषित स्थितियों में कुछ किसान केवल 50-75 कि.ग्रा. गेहूं के बीजों की बुआई छितराकर करते हैं। पौधों की कम संख्या और आंतर अंतराल में बढ़ौतरी से टिलरस अधिक संख्या में होते हैं और उत्पादकता भी अधिक होती है। जैव विविधता बनाए रखने के लिए, बुआई के समय गेहूं के बीजों के साथ 3 कि.ग्रा. मसर | और 500 ग्राम सरसों के बीज मिलाए जा सकते हैं। गेहूं की प्रत्येक 8-12 पंक्तियों के बाद उभार लिए मेंढों पर एक पंक्ति राजमाह की बुआई की जा सकती है और गेहूं की प्रत्येक पंक्ति में कहीं-कहीं सरसों की बुआई की जा सकती है।

मृदा उर्वरकता प्रबंधन


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जैविक खेती में रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं किया जाता। अतः 15 टन देसी खाद + 2 टन बी.डी. कम्पोस्टर प्रति हैक्टेयर या केंचुआ खाद 10 टन + बी.डी. कम्पोस्ट 2 टन प्रति हैक्टेयर उपयुक्त होती है। गेहूं से पूर्व फसल (खरीफ में) प्रति एकड़ को पर्याप्त उर्वरक (1-2 टन कपोस्ट), 100 कि.ग्रा. रॉक - फॉस्फेट और 2 कि.ग्रा. पीएसबी दिया जाना चाहिए। खरीफ की फसल के बाद, फसल के अवशेषों को एकत्र कर ढेर के रूप में मेढ़ों पर रख दें। अवशेष के ढेर को गाय के गोबर - गौमूत्र के घोल (50 लीटर/टन) और ट्रिकोडर्मा विरदी (1 कि.ग्रा. प्रति टन) सस्य से भिगो दें। बुआई के समय 2.0 कि.ग्रा. पीएसबी के साथ 8-10 क्विंटल एफवाईएम/कपोस्ट अथवा 5-10 कि.ग्रा. चूना भी मिलाया जाना चाहिए। 200-300 कि.ग्रा. सांद्रित उर्वरक (शुष्क मुर्गी उर्वरक और खली का चूरा 1:1 अथवा कोई अन्य किस्म) और ड्रिलिंग से 150-200 कि.ग्रा. नीम/पोंगम/अरंडी/मूंगफली केक से उत्पादकता में बढ़ौतरी होगी। फॉस्फोरस की उपलब्धता में बढ़ौतरी के लिए अंडे के छिलके का उर्वरक अथवा बायोडाइनेमिक्स कपोस्ट भी प्रयोग किया जा सकता है। सूक्ष्मजीवों की शीघ्र बढ़ौतरी और विभिन्न पोषक तत्वों के शीघ्र मोचन के लिए संजीवक अथवा अमृतपानी अथवा जीवामृत का समय पर प्रयोग आवश्यक है। इन तीनों में से, जीवामृत सबसे अधिक प्रभावी है। बुआई के बाद पहली चार सिंचाईयों के दौरान यथा: 21, 42, 60 और 75 दिनों के बाद 500 लीटर जीवमृत प्रति हैक्टेयर प्रयोग की जाती है। फसल की उचित वृद्धि के लिए 20 दिनों के बाद 7-10 दिनों के अंतराल पर दानों के निर्माण की अवस्था तक पत्ते पर छिड़काव के तौर पर वर्मीवश और गौमूत्र का प्रयोग किया जाए। एक एकड़ क्षेत्र में छिड़काव के लिए लगभग 200 लीटर पानी में 20 लीटर गौमूत्र मिलाएं। पानी की उपलब्धता के आधार पर गेहूं की अच्छी उपज लेने के लिए निम्नलिखित सिंचाई की व्यवस्था करनी चाहिए।

सिंचाई और पानी

























गेहूं की फसल में जो संभव सिंचाईयां दी जा सकेंफसल की बढ़ौतरी की विभिन्न अवस्थाएं जब सिंचाई देनी चाहिए।
सिंचाईमूसल जड़े निकलने परदौजियां निकलने की अंतिम अवस्था परगांठ बनने अंतिम की अवस्था पर

 
फूल आने की अंतिम अवस्था परदानों में दूध पड़ने पर

 
एक

दो

तीन

चार

पांच
सिंचाई दें

सिंचाई दें

सिंचाई दें

सिंचाई दें

सिंचाई दें
 

 

 

 

सिंचाई दें

सिंचाई दें
 

 

सिंचाई दें

सिंचाई दें

सिंचाई दें
 

सिंचाई दें

सिंचाई दें

सिंचाई दें

सिंचाई दें
 

 

 

 

 

सिंचाई दें

 

यदि सिंचाई की और व्यवस्था हो, तो बिजाई से पहले सिंचाई करनी चाहिए या बिजाई के 30-40 दिनों के बाद सिंचाई देनी चाहिए।

सस्य विधियां और खरपतवार प्रबंधन


मल्चिंग और सतह प्रबंधन- बुआई से 24 - 48 घंटों के बाद ढाल के अनुसार खेतों को छोटी मेंढे बनाकर छोटी क्यारियों में विभाजित कर दें। मल्च का कार्य करने के लिए खरीफ की फसल के आंशिक तौर पर विघटित फसल अवशेष (मेंद्रों पर पड़े हुए) को पूरे खेत पर फैला दें।

निराई- सिंचित दशा में, न्यूनतम 3 बार निराई आवश्यक है, प्रथम 20-25 दिनों, द्वितीय 40-45 दिनों और तृतीय 60-65 दिनों के अंतराल पर। वर्षापोषित परिस्थितियों में दो बार निराई जरूरी होती है। जैविक प्रबंधन के तहत हाथ से निराई सबसे अधिक प्राथमिकता वाली विधि है।

अतिरिक्त फसल प्रणाली


गेहूं को प्रायः मक्की/धान की फसल प्रणाली के साथ लगाया जाता है। परंतु सिंचित अवस्थाओं में धान-मूली-आलू, मक्की-मूली-प्याज, मक्की-तोरिया-आलू और मक्की-तोरिया + गोभी सरसों फसल चक्र अधिक आय देने वाले हैं। असिंचित अवस्थाओं में मक्की-तोरिया + गोभी सरसों, मक्की-चना और मक्की+रौंगी-गेहूं फसल प्रणालियां, मक्की-गेहूं फसल चक्र से अधिक लाभदायक हैं। खंड-1 के असिंचित क्षेत्रों में अरहर (सरिता) - गेहूं (वी.एल.- 892/एनएस.-490) फसल चक्र मक्की -गेहूं फसल चक्र अधिक लाभदायक है।

फसल की सुरक्षा


कीट प्रबंधन















दीमक व टीडे मकौड़ेदीमक फसल की वृद्धि की किसी भी अवस्था में फसल को क्षति पहुंचा सकती है। यह समस्या सिंचित क्षेत्रों की अपेक्षा वर्षापोषित क्षेत्रों में अधिक प्रमुख है। गैर - सिंचित दशाओं में अविघटित कार्बनिक खाद के प्रयोग से भी दीमक के प्रकोप की संभावना बढ़ सकती है। बुआई के समय मृदा में नीम के पत्ते की खाद (5 क्विंटल/है0) अथवा नीम खाद (1 क्विंटल/है0) के प्रयोग से दीमक के आक्रमण से बचा जा सकता है। चूना और गंधक का मिश्रण जमीन में डालने से दीमक के प्रकोप में कमी आती है। लकड़ी की राख को पौधों के तनों के मूल में डालने से भी दीमक के प्रकोप में कमी आती है। पशु - मूत्र को पानी में 1:6 में मिलाकर बार - बार दीमक के घरों में डालने से उनके प्रसार को रोका जा सकता है। वीवेरिया या मेटाराईजियम फफूद का कण अवस्था में (6 ग्राम प्रति वर्ग मीटर) प्रयोग करें।

 
आर्मी वॉर्मस

 
इस कीट की इल्ली पौधे विशेषकर उसके नाजुक अंगों को रात्रि के दौरान खाती है और दिन के समय छिपी रहती है। वे पत्तों और बालियों को भी क्षति पहुंचाती है। नीम के पत्तों के सत्व (उबले हुए पानी में 5 कि.ग्रा. टुकड़े-टुकड़े नीम के पत्ते और 100 लीटर पानी में विघटित) से इसके आक्रमण को प्रभावी तौर पर कम किया जा सकता है। संडियों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें। एन.पी.वी., वी.टी. का प्रयोग करें। या दशपर्णी का 10 प्रतिशत घोल का प्रयोग करें।
बाउन व्हीट इल्ली, एफिड्स और जैस्सिड्सगेहूं के साथ सरसों और कुसुम (बुआई के समय प्रत्येक 100 कि.ग्रा. गेहूं के साथ मिश्रित 100 ग्राम बीज) का आंतर फसल से भी कुटकी के फैलाव को प्रभावी तौर पर नियंत्रित किया जा सकता है। गंभीर आक्रमण की स्थिति में, 3-5 दिन तक 100 लीटर पानी में 15 लीटर गौमूत्र, 2 कि.ग्रा. गाय के गोबर और 15 कि.ग्रा. टुकड़े-टुकड़े किए नीम के पत्तों का प्रयोग करें। खमीर को छानें और एक एकड़ में पत्तों पर छिड़काव के लिए प्रयोग करें। यह पालतू जानवरों के प्राकृतिक शत्रुओं जैसे सुररखी आदि के लिए सुरक्षित है।

रोग प्रबंधन

















रतुआ

 
रतुआ फफूदी, रोग की तीन भिन्न प्रजातियों की वजह से होता है। भूरा और पीला रतुआ उत्तरी - पश्चिमी भाषा में विशेष महत्व रखते हैं। इन क्षेत्रों में काला रतुआ काफी विलम्ब से दिखाई देता है और सामान्यतः काफी विलंब से बुआई वाले खेतों को छोड़ अधिक क्षति नहीं पहुंचाते। तथापि, मध्य और पूर्वी भारत में काला रतुआ भयंकर रूप में प्रकट होता है और काफी अधिक नुकसान पहुंचाता है। रतुओं को नियंत्रित करने हेतु सर्वाधिक प्रभावी विधि रतुआ - प्रतिरोधी किस्में उगाना है। गेहूं की किस्मों के बीच जैव विविधता से भी रतुआ की समस्या को प्रभावी तौर पर नियंत्रित किया जा सकता है। प्रत्येक फार्म पर एक समय में गेहूं की 3-4 किस्मों का प्रयोग करें। विलम्ब से बुआई अथवा देरी से परिपक्व होने वाली किस्मों से बचा जाए। फसल को रतुआ के संक्रमण से बचाने के लिए 200 लीटर पानी के सज्ञथ 5 लीटर खट्टी छाछ का छिड़काव करें। रतुआ के संक्रमण से बचने के लिए (चौलाई अथवा लाल भाजी - एक आम हरी पत्तेदार सब्जी) अथवा मैंथा (पुदीना) के पत्तों के चूर्ण को भी महीन छिड़काव (प्रति लीटर पानी 25-30 ग्राम सूखे पत्तों का पाउडर) के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। रतुआ संक्रमण रोकने के लिए हिबिस्कस रोसा-चानेन्सीस (चीनी गुलाब) के सूखे पत्तों का सार भी पत्तों पर छिड़काव के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है।
खुला काला चुर्णिल रोग

 
सभी किस्मों में बाहरी लक्षण रोगग्रस्त पौधे की लगभग प्रत्येक बाल में गेहूं के दानों खाद्यान्न के स्थान पर काले चूर्ण का बनना है। जैविक खेती के तहत प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। इसके अतिरिक्त, चूंकि यह रोग बीजजन्य है, रोगमुक्त बीज के प्रयोग से इसे होने से रोका जा सकता है। शंका की स्थिति में, बीज को 5 प्रतिशत वर्मीवाश से संसाधिक करें। संक्रमित पौधों को उखाड़ दें और उनके बीजाणुओं के छितरने से पहले उन्हें जला दें। झुलसाने वाली गर्मी वाले क्षेत्रों में बीजों के धूप के ताप में संसाधन से भी इसके रोगवाहक को काफी हद तक समाप्त किया जा सकता है।

 
बंटुआ

 
उत्तरी भारत में गेहूं की सभी व्यावसायिक किस्मों में करनाल बंटुआ की समस्या आम है। किन्तु यह रोग पारंपरिक किस्मों में काफी दुर्लभ है। इस रोग से गेहूं के गुणवत्ता और परिमाण, दोनों में कमी आती है। खाद्यान्न का एक अंश, इसकी लीक के साथ-साथ काले चूर्ण सामग्री में परिवर्तित हो जाता है, जिसमें से बदबू आती है। प्रतिरोधी किस्में उगाना विकल्प है। रोगमुक्त बीजों का प्रयोग करें। बीजों को 5 प्रतिशत वर्मीवॉश से पूर्व संसाधित करें। 100 लीटर जल में 1 कि.ग्रा. सरसों के आटे और 5 लीटर दूध के मिश्रण का पत्तों पर छिड़काव के तौर पर प्रतिशत नमी की संस्तुति की जाती है। प्राकृतिक अथवा यांत्रिक स्रोतों से इसे सूखाया जाता है। 30 से 40 डिग्री से0 तापमान पर 13 प्रतिशत से अधिक नमी होने पर गेहूं में फफूदी लग सकती है जिसके कारण इसमें फफूदीदार दुर्गंध, बदरंगपन और निम्न आटा का उत्पादन होता है। गेहूं के लिए संतुलित नमी मात्रा 70 प्रतिशत सापेक्षिक आर्द्रता पर 13.5 प्रतिशत है। अल्पकाल के लिए, भण्डारण में 13 से 14 प्रतिशत नमी की मात्रा सह्य है जबकि 5 वर्ष तक की लंबी अवधि तक के लिए यह 11 से 12 प्रतिशत होनी चाहिए। इसे भृग से बचाने के लिए 0.5 प्रतिशत का तेज काली मिर्च पाउडर मिश्रित करें। गाय का गोबर अथवा 2 प्रतिशत नीम पाउडर भंडारित गेहूं को सूंडी और अन्य पीड़कों से बचाते हैं।

उपज


जैविक तौर पर उगाए गेहूं की औसत उत्पादकता 40-50 क्विंटल/है0 के बीच होती हैं।


गेहूँ






































मध्य प्रदेश कम लागत से अधिक उत्पादन लेने हेतु नवीनतम  गेहूँ उत्पादन तकनीक
राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक परिदृश्य-



























क्षेत्रफल (मि.हे.)उत्पादन (मि.टन)उत्पादकता (क्विं/हे.)
भारत29.793.531.5
मध्य प्रदेश5.313.35.3
प्रदेश की भागीदार18%14%18%

प्रदेश में गेहूँ  उत्पादकता से सम्बन्धित समस्याये
(अ) असिंचित / सीमित सिंचाई क्षेत्रों से सम्बन्धित-

  • विगत सात वर्षों का तापक्रम औसत विवरण निम्न हैं।
    निम्न तापक्रम में वृद्धि 2 - 30 सें
    उच्च तापक्रम में वृद्धि 3 - 50 सें

  • नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक तापक्रम में अधिक उतार - चढ़ाव

  • वास्तविक उच्च ताप प्रतिरोधि किस्मों का अभाव जो बदलते परिवेश में सामंजस्य कर सके

  • अंकुरण के समय नमी का क्षरण तथा दाना भरते समय उच्च तापक्रम

  • असिंचित क्षेत्रों में रूट राट (Root Rot) (जड़ सड़न) की समस्या

  • सोयाबीन - गेहूँ फसल प्रणाली में असिंचित/अर्धसिंचित गेहूँ  की देरी से बोवाई (प्रचलित किस्में लम्बी अवधि की है)

  • प्रचलित किस्मों की कम ‘‘जल उपयोग‘‘ तथा ‘‘पोषक तत्व उपयोग‘‘ क्षमता


(ब.) सिंचित क्षेत्रों से सम्बन्धित

  • रबी मौसम में ठण्ड की अवधि कम Short winter

  • अनिश्चित मौसम

  • कल्ले निकलने के समय तथा परागण के समय तापक्रम में वृद्धि जिससे समय से पूर्व फसल में परिपक्वता आती है

  • परिणाम स्वरूप दानों का भराव कम

  • उच्च तापक्रम के कारण भूमि से वाष्पन अधिक जिससे सिंचाई की संख्या तथा सिंचाई के पानी की मात्रा में वृद्धि

  • कमाण्ड क्षेत्रों में भी समय पर सिंचाई के लिए पानी की अनुपलब्धता

  • सिंचित क्षेत्रों में Seepage  तथा जल भराव की समस्या

  • बहु फसल प्रणाली के कारण देरी से बुवाई का अधिक रकबा


प्रदेश में गेहूँ की काश्त का बदलता स्वरूप
(अ)  पूर्व के वर्षों में असिंचित रकबा अधिक

  • अब पूर्ण रूप से असिंचित रकबे में उल्लेखनीय कमी

  • संचित नमी (Conserved Moisture)  में खेती लगभग समाप्त

  • स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति ने इस परिदृष्य को बदला

  • लगभग पूरे प्रदेशमें कम से कम एक सिंचाई का उपयोग अतः पूर्णतः असिंचित रकबा लगभग समाप्त


(ब) सिंचित गेहूँ क्षेत्र में वास्तविक परिदृष्टि में सीमित सिंचाई उपलब्धता

  •  सिंचित शब्द से आभास होता है कि 5 -6 सिंचाई की उपलब्धता है

  •  वास्तविक रूप में पूरे प्रदेश में 5 - 6 सिंचाई अनुपलब्धता

  •  यहाँ तक कि समय से बोये गये गेहूँ में भी अधिकांश क्षेत्रों में मात्र 3 सिंचाई उपलब्धता

  •  देरी से बुवाई की स्थिति में मात्र दो सिंचाई उपलब्धता


उत्पादन तकनीक
खेत की तैयारी

  • ग्रीष्मकालीन जुताई

  • तीन वर्षों में एक बार गहरी जुताई

  • काली भारी मिट्टी को भुरभुरा (Fine Tilth) बनाना कठिन

  • रोटावेटर का प्रयोग उपयुक्त डिस्क हैरो का भी प्रयोग उपयुक्त बुवाई का उचित समय

  • असिंचित: मध्य अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक

  • अर्धसिंचित: नवम्बर माह का प्रथम पखवाड़ा

  • सिंचित (समय से): नवम्बर माह का द्वितीय पखवाड़ा

  • सिंचित (देरी से): दिसंबर माह का द्वितीय सप्ताह से


उपयुक्त किस्मों का चयन
(अ) मालवा अंचल: रतलाम, मन्दसौर,इन्दौर,उज्जैन,शाजापुर,राजगढ़,सीहोर,धार,देवास तथा गुना का दक्षिणी भाग
क्षेत्र की औसत वर्षा: 750 से 1250 मि.मी.
मिट्टी: भारी काली मिट्टी














असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 17,
जे.डब्ल्यू. 3269,
जे.डब्ल्यू. 3288,
एच.आई. 1500,
एच.आई. 1531,
एच.डी. 4672 (कठिया)
जे.डब्ल्यू. 1201,
जे.डब्ल्यू. 322,
जे.डब्ल्यू. 273,
एच.आई. 1544,
एच.आई. 8498 (कठिया),
एम.पी.ओ. 1215
जे.डब्ल्यू. 1203,
एम.पी. 4010,
एच.डी. 2864,
एच.आई. 1454

(ब) निमाड अंचल: खण्डवा, खरगोन, धार एवं झाबुआ का भाग
क्षेत्र की औसत वर्षा: 500 से 1000 मि.मी.
मिट्टी: हल्की काली मिट्टी













असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 3020,
जे.डब्ल्यू. 3173,
एच.आई. 1500,
जे.डब्ल्यू. 3269
जे.डब्ल्यू. 1142,
जे.डब्ल्यू. 1201,
जी.डब्ल्यू. 366,
एच.आई. 1418
इस क्षेत्र में देरी से बुआई से बचें समय से बुआई को प्राथमिकता क्योंकि पकने के समय पानी की कमी।
किस्में: जे.डब्ल्यू. 1202,
एच.आई. 1454

(स) विन्ध्य पठार: रायसेन, विदिशा, सागर, गुना का भाग
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1120 से 1250 मि.मी.
मिट्टी: मध्य से भारी काली जमीन













असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 17,
जे.डब्ल्यू. 3173,
जे.डब्ल्यू. 3211,
जे.डब्ल्यू. 3288,
एच.आई. 1531,
एच.आई. 8627(कठिया)
जे.डब्ल्यू. 1142,
जे.डब्ल्यू. 1201,
एच.आई. 1544,
जी.डब्ल्यू. 273,
जे.डब्ल्यू. 1106 (कठिया),
एच.आई. 8498 (कठिया),
एम.पी.ओ. 1215 (कठिया),
जे.डब्ल्यू. 1202,
जे.डब्ल्यू. 1203,
एम.पी. 4010,
एच.डी. 2864,
डी.एल. 788- 2

(द) नर्मदा घाटी: जबलपुर, नरसिंहपुर, होषंगाबाद, हरदा
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1000 से 1500 मि.मी.
मिट्टी: भारी काली एवं जलोढ मिट्टी













असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 17,
जे.डब्ल्यू. 3288,
एच.आई. 1531,
जे.डब्ल्यू. 3211,
एच.डी. 4672 (कठिया)
जे.डब्ल्यू. 1142,
जी.डब्ल्यू. 322, जे.डब्ल्यू. 1201, एच.आई. 1544, जे.डब्ल्यू. 1106, एच.आई. 8498, जे.डब्ल्यू. 1215
जे.डब्ल्यू. 1202,
जे.डब्ल्यू. 1203,
एम.पी. 4010,
एच.डी. 2932,

(य) बैनगंगा घाटी:  बालाघाट एवं सिवनी
क्षेत्र की औसत वर्षा:  1250मि.मी.
मिट्टी:  जलोढ मिट्टी













असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 3269,
जे.डब्ल्यू. 3211,
जे.डब्ल्यू. 3288,
एच.आई. 1544,
जे.डब्ल्यू. 1201,
जी.डब्ल्यू. 366,
एच.आई. 1544,
राज 3067
जे.डब्ल्यू. 1202,
एच.डी. 2932,
डी.एल. 788- 2

(र) हवेली क्षेत्र: रीवा, जबलपुर का भाग, नरसिंहपुर का भाग
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1000 से 1375 मि.मी.
मिट्टी: हल्की कंकड़युक्त मिट्टी
वर्षा के पानी को बंधान के द्वारा खेत में रोका जाता है।













असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 3020,
जे.डब्ल्यू. 3173,
जे.डब्ल्यू. 3269,
जे.डब्ल्यू. 17,
एच.आई. 1500,
जे.डब्ल्यू. 1142,
जे.डब्ल्यू. 1201,
जे.डब्ल्यू. 1106,
जी.डब्ल्यू. 322,
एच.आई. 1544,
जे.डब्ल्यू. 1202,
जे.डब्ल्यू. 1203,
एच.डी. 2864,
एच.डी. 2932,

ल. सतपुड़ा पठार: छिंदवाड़ा एवं बैतूल
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1000 से 1250 मि.मी.
मिट्टी: हल्की कंकड़युक्त मिट्टी













असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 17,
जे.डब्ल्यू. 3173,
जे.डब्ल्यू. 3211,
जे.डब्ल्यू. 3288,
एच.आई. 1531,
एच.आई. 1418,
जे.डब्ल्यू. 1201,
जे.डब्ल्यू. 1215,
जी.डब्ल्यू. 366,
एच.डी. 2864,
एम.पी. 4010,
जे.डब्ल्यू. 1202,
जे.डब्ल्यू. 1203,

(व) गिर्द क्षेत्र: ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना एवं दतिया का भाग
क्षेत्र की औसत वर्षा: 750 से 1000 मि.मी.
मिट्टी: जलोढ़ एवं हल्की संरचना वाली जमीनें













असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 3288,
जे.डब्ल्यू. 3211,
जे.डब्ल्यू. 17,
एच.आई. 1531,
जे.डब्ल्यू. 3269,
एच.डी. 4672
एच.आई. 1544,
जी.डब्ल्यू. 273,
जी.डब्ल्यू. 322,
जे.डब्ल्यू. 1201,
जे.डब्ल्यू. 1106,
जे.डब्ल्यू. 1215,
एच.आई. 8498
एम.पी. 4010,
जे.डब्ल्यू. 1203,
एच.डी. 2932,
एच.डी. 2864

(ह) बुन्देलखण्ड क्षेत्र: दतिया, शिवपुरी, गुना का भाग टीकमगढ़,छतरपुर एवं पन्ना का भाग
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1120 से 1250 मि.मी.
मिट्टी: लाल एवं काली मिश्रित जमीन













असिंचित/अर्धसिंचितसिंचित(समय से)सिंचित(देरी से)
जे.डब्ल्यू. 3288,
जे.डब्ल्यू. 3211,
जे.डब्ल्यू. 17,
एच.आई. 1500,
एच.आई. 153
जे.डब्ल्यू. 1201,
जी.डब्ल्यू. 366,
राज 3067,
एम.पी.ओ. 1215,
एच.आई. 8498
एम.पी. 4010,
एच.डी. 2864

विशेष : सभी क्षेत्रों में अत्यन्त देरी से बुवाई की स्थिति में किस्में: एच.डी. 2404, एम.पी. 1202



















जी डब्लू 173लोक 1एम पी 4010
एम पी 1202एम पी 1203एच डी 2864
मध्य प्रदेश  राज्य वर्ष 2003 से कठिया गेहूँ कृषि निर्यात जोन चिन्हित किया गया है।
प्रदेश के गेहू उत्पादन में कठिया किस्मों का 8 से 10 प्रतिशत  योगदान है।

उन्नत कठिया किस्मएच डी 8713 (पूसा मंगल) ,एच आई 8381 (मालवश्री) ,एच आई 8498 (मालवशक्ति) ,एच आई 8663 (पोषण),एम पी ओ 1106 (सुधा),एम पी ओ 1215, एच डी 4672(मालवरत्न) ,एच आई 8627 (मालवर्कीति)







जे डब्लू 3211जे डब्लू 3173

बीज की मात्रा

  • औसत रूप में 100 कि.ग्रा./हे. (हजार दाने का वजन 40 ग्राम तक है)

  • हजार दाने का वजन 1 ग्राम बढ़ने पर (40 ग्राम के उपर), 2.5 कि.ग्रा. प्रति/हे. बढ़ाते जायें

  • असिंचित / अर्धसिंचित दशा में कतार से कतार की दूरी 25 से.मी.

  • सिंचित (समय से) बुवाई की स्थिति में 23 से.मी.

  • बीज को उर्वरक के साथ न मिलाये

  • मिलाने पर 32 प्रतिशत  अंकुरण की कमी (5 वर्षो के अनुसंधान आँकड़े)

  • क्योंक गेहूँ  की फसल में अनुकूल मौसम होने पर प्रत्येक अवस्था में क्षतिपूर्ति रखने की क्षमता है।

  • अतः बीज कम फर्टिलाइजर ड्रिल का प्रयोग करें।


बीजोपचार 

  • बुवाई से पूर्व बीजों को उपचारित कर ही बोयें, बीजोपचार के लिये कार्बाक्सिन 75%, wp/कार्बनडाजिम 50% wp 2.5-3.0 ग्राम दवा/किलो बीज के लिए पर्याप्त होती है।

  • टेबूकोनोजाल 1 ग्राम/किलो बीज से उरापचारित करने पर कण्डवा रोग से बचाव होता है।

  • पी एस बी कल्चर 5 ग्राम/किलो बीज से उपचारित करने पर फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ती है।


पोषक तत्वों का प्रयोग 

  • मिट्टी परीक्षण अवश्य करायें

  • परीक्षण के आधार पर नत्रजन, फास्फेट एवं पोटाश की मात्रा का निर्धारण अनुशंसा -

  • प्रदेश में लगभग सभी जिलों में सूक्ष्म तत्वों की कमी

  • 25 कि.ग्रा./हे. की दर से जिंक सल्फेट का प्रयोग

  • जिंक सल्फेट का प्रयोग 3 फसल के उपरांत (न की प्रत्येक वर्ष)



































नत्रजनफास्फोरस पोटाष
असिंचित40200 कि.ग्रा./हे.
अर्धसिंचित603015 कि.ग्रा./हे.
सिंचित1206030 कि.ग्रा./हे.
देरी से804020 कि.ग्रा./हे.

सिंचाई -

  • जहाँ तक सम्भव हो स्प्रिंकलर का उपयोग करें

  • विश्वविद्यालय  से विकसित नयी किस्मों में 5 - 6 सिंचाई की आवश्यकता  नहीं

  • 3 - 4 सिंचाई पर्याप्त (55 - 60क्विंटल उपज)

  • एक सिंचाई: 40 - 45 दिनों बाद

  • दो सिंचाई: किरीट अवस्था, फूल निकलने के बाद

  • तीन सिंचाई: किरीट अवस्था, पूरे कल्ले निकलने पर, दाना बनने के समय

  • चार सिंचाई: किरीट अवस्था, पूरे कल्ले निकलने पर, फूल आने पर, दूधिया अवस्था


लागत में कमी (नयी तकनीक)मेड़ - नाली पद्धति

  • बीज एवं उर्वरक में महंगे आदान इन्हें कम करने के लिये मेड़ - नाली पद्धति (FIRB)अपनाये बीज दर 30 - 35 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है

  • उर्वरक की खपत में कमी

  • नींदा नियंत्रण आसान

  • सिंचाई में पानी की कम मात्रा


अधिक गेहूँ  उत्पादन के विभिन्न तकनीकेंजीरो टिलेज तकनीक:-
धान की पछेती फसल की कटाई के उपरांत खेत में समय पर गेहूँ की बोनी के लिय समय नहीं बचता और खेत ,खाली छोड़ने के अलावा किसान के पास विकल्प नहीं बचता ऐसी दशा में एक विशेष प्रकार से बनायी गयी बीज एवं खाद ड्रिल मशीन से गेहूँ  की बुवाई की जा सकती है।
जिसमें खेत में जुताई की आवश्यकता नहीं पड़ती धान की कटाई के उपरांत बिना जुताई किए मशीन द्वारा गेहूँ  की सीधी बुवाई करने की विधि को जीरो टिलेज कहा जाता है। इस विधि को अपनाकर गेहूँ  की बुवाई देर से होने पर होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है एवं खेत को तैयारी पर होने वाले खर्च को भी कम किया जा सकता है।
इस तकनीक को चिकनी मिट्टी के अलावा सभी प्रकार की भूमियों में किया जा सकता है। जीरो टिलेज मशीन साधारण ड्रिल की तरह ही है इसमें  टाइन चाकू की तरह है यह टाइन्स मिट्टी में नाली जैसी आकार की दरार बनाता है जिससे खाद एवं बीज उचित मात्रा एवं गहराई पर पहुँचता है। इस विधि के निम्न लाभ है।:-जीरो टिलेज तकनीक के लाभ :-

  • इस मशीन द्वारा बुवाई करने से 85-90 प्रतिशत इंधन, उर्जा एवं समय की बचत की जा सकती है।

  • इस विधि को अपनाने से खरपतवारों का जमाव कम होता है।

  • इस मशीन के द्वारा 1-1.5 एकड़ भूमि की बुवाई 1 घंटे में की जा सकती हैं यह कम उर्जा की खपत तकनीक है अतः समय से बुवाई की दशा में इससे खेत तैयार करने की लागत 2000-2500 रू. प्रति हेक्टर की बचत होती है।

  • समय से बुवाई एवं 10-15 दिन खेत की तैयारी के समय को बचा कर बुवाई करने से अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।

  • बुवाई शुरू करने से पहले मशीन का अंशशोधन कर ले जिससे खाद एवं बीज की उचित मात्रा डाली जा सके।

  • इस मशीन में सिर्फ दानेदार खाद का ही प्रयोग करें जिससे पाइपों में अवरोध उत्पन्न न हो।

  • मशीन के पीछे पाटा कभी न लगाएँ।


फरो इरीगेशन रेज्ड बेड (फर्व) मेड़ पर बुवाई तकनीक:-

  • मेड़ पर बुवाई तकनीक किसानों में प्रचलित कतार में बोनी या छिड़ककर बोनी से सर्वथा भिन्न है इस तकनीक में गेहूँ को ट्रेक्टर चलित रोजर कम ड्रिल से मेड़ों पर दो या तीन कतारों में बीज बोते है। इस तकनीक से खाद एवं बीज की बचत होती है। एवं उत्पादन भी प्रभावित नहीं होता है। इस तकनीक से उच्च गुणवत्ता वाला अधिक बीज उत्पादन किया जा सकता है।


मेड़ पर (फर्व) फसल लेने से लाभ

  • बीज, खाद एवं पानी की मात्रा में कमी एवं बचत, मेडों में संरक्षित नमी लम्बे समय तक फसल को उपलब्ध रहती है एवं पौधों का विकास अच्छा होता है।

  • गेहूँ उत्पादन लागत में कमी।

  • गेहूँ की खेती नालियों एवं मेड़ पर की जाती इससे फसल गिरने की समस्या नहीं होती। मेड पर फसल होने से जड़ों की वृद्धि अच्छी होती है एवं जड़ें गहराई से नमी एवं पोषक तत्व अवशोषित करते हैं।

  • इस विधि से गेहूँ उत्पादन में नालियो का प्रयोग सिंचाई के लिये किया जाता है यही नालियाँ अतिरिक्त पानी की निकासी में भी सहायक होती हैं।

  • दलहनी एवं तिलहनी फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है।

  • मशीनो द्वारा निंदाई गुड़ाई भी की जा सकती है।

  • अवांछित पौधों को निकालने में आसानी रहती है।


वैष्विक उष्णता

  • एक शताब्दी के मौसम आँकड़ों से स्पष्ट है कि 2009 - 10 में तापमान (निम्न) 10 सें. अधिक तथा उच्च तापमान 20 सें. अधिक रहा

  • जवाहरलाल नेहरू कृषि  विश्वविद्यालय द्वारा जे.डब्ल्यू. 1142, जे.डव्ल्यू. 1201, जे.डब्ल्यू. 3211 एवं जे.डब्ल्यू. 3288 किस्में विकसित की गई उच्च ताप पर भी अधिक उत्पादन देने की क्षमता है।


जल तथा पोषक तत्व उपयोग क्षमता

  • निरंतर सिंचाई जल का भूमि में क्षरण तथा सिंचाई जल की कमी से फसल प्रभावित

  • अधिक ‘‘जल उपयोग क्षमता‘‘ एवं ‘‘पोषक तत्व उपयोग क्षमता‘‘ वाली किस्मों का विकास किया गया












































किस्मअवस्था (उपज क्विंटल /हे.)
असिंचितएक सिंचाईदो सिंचाई
जे.डब्ल्यू. 1718-2030-32-
जे.डब्ल्यू. 302018-2032-3440-42
जे.डब्ल्यू. 317318-2034-3640-42
जे.डब्ल्यू. 321118-2037-3943-45
जे.डब्ल्यू. 326918-2037-3943-45

 

काले गेरूआ के नये प्रभेद का प्रकोप (UG 99)

  • मध्य प्रदेश काला गेरूआ के प्रकोप के लिये सबसे अनुकूल

  • गेरूआरोधी किस्मों के विकास के कारण नियंत्रण


जवाहरलाल नेहरू कृषि  विश्वविद्यालय द्वारा एम पी ओ 1215, एम पी 3336, एम पी 4010 किस्में विकसित की इन किस्मों को ‘‘कीनिया‘‘में परीक्षण किया गया। सभी किस्में भन्ह 99 के प्रतिरोधी एवं अधिक उत्पादन देने की क्षमता है।








गुणों का संकलन (Value addition)

  • म.प्र. का गेहूँ देश में गुणवत्ता में सर्वश्रेष्ठ दानों की चमक तथा दानों का वजन अधिक

  • दूसरे राज्यों की तुलना में प्रोटीन की मात्रा 1 प्रतिशत  अधिक

  • अभी तक प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने का प्रयास किया गया

  • वर्तमान में विकसित किस्में सूक्ष्म तत्वों से भरपूर है।

  • विश्वविद्यालय से विकसित किस्में जे.डब्ल्यू. 1202 एवं जे.डब्ल्यू. 1203 में, देश में विकसित अन्य किस्मों की अपेक्षा सबसे अधिक प्रोटीन

  • वर्तमान में  विश्वविद्यालय विकसित किस्मों में सबसे अधिक ‘‘विटामिन ए‘‘

  • सबसे अधिक लोहा, जिंक तथा मैगनीज


ज.ने.कृ.वि.वि. द्वारा विकसित किस्मों में गुणवत्ता का समादेश














































































ट्रेंटकिस्म
जे.डब्ल्यू1201जे.डब्ल्यू1203जी.डब्ल्यू. 173डी.एल. 788-2 एम.पी.4010
प्रोटीन प्रतिशत12.6413.5012.2012.412.43
सेडीमेंटशन वेल्यू4338384041
एक्सटेªक्षन रेट70.670.970.469.569.9
ग्लूटेन इंडेक्स6352515648
बी - केरोटीन3.103.772.192.612.81
लोहा (पी.पी.एम.)42.233.937.037.140.5
जिंक (पी.पी.एम.)41.935.333.933.634.4
मैंग्नीज (पी.पी.एम.)51.949.741.350.843.5

म.प्र. का सकारात्मक पक्ष

  • असिंचित क्षेत्र में कमी

  • सिंचाई की सुविधाऐं बढ़ी

  • स्प्रिंकलर पद्धति का उपयोग

  • उर्वरक की खपत बढ़ी

  • सूक्ष्म तत्वों का भी उपयोग बढ़ा

  • नये किस्मों के विकास की गति एवं उपलब्धता संतोषजनक

  • अच्छी गुणवत्ता के बीजों की उपलब्धता

  • उदाहरण के रूप में  विश्वविद्यालय ‘‘बीज उत्पादन‘‘ में देश  में प्रथम

  • कठिया गेहूँ में ‘‘करनाल बन्ट, यलोबेरी, कालाधब्बा‘‘ आदि के प्रकोप से मुक्त

  • अतः निर्यात की सम्भावना बढ़ी


खरपतवार नियंत्राणखरपतवारों द्वारा 25-35 प्रतिशत  तक उपज में कमी आने की संभावना बनी रहती है। यह कमी फसल में खरपतवारों की सघनता पर निर्भर करती है उत्पादन में कमी के अलावा फसल को दिये गये पोषक तत्व, जल, प्रकाश एवं स्थान आदि का उपयोग खरपतवार के पौधों के स्वयं के द्वारा करने के कारण होती है गेहूँ  में नीदाँ नियंत्रण उपायों को मुख्यतः तीन विधियों से किया जा सकता है।
गेहूँ की फसल में होने वाले खरपतवार मुख्यतः दो भागों में बांटे जाते है।

  • चौड़ी पत्ती - बथुआ, सेंजी, दूधी, कासनी, जंगली पालक अकरी, जंगली मटर, कृष्णनील, सत्यानाषी हिरनखुरी आदि।

  • सकरी पत्ती - मोथा, कांस, जंगली जई, चिरैया बाजरा एवं अन्य घासें।


रासायनिक विधि:-रासायनिक विधि से नींदा तक को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि इससे समय की बचत होती है। रूप से भी लाभप्रद रहता है। इस विधि से नींदा नियंत्रण निम्न प्रकार करते हैं -नींदनाशक रसायनों की मात्रा एवं प्रयोग समय:-













































नींदानाशकखरपतवारदर/हे.प्रयोग का समय
पेण्डीमिथेलीन संकरी एवं चौड़ी1.0 किग्रा.बुवाई के तुरन्त बाद
सल्फोसल्फूरान संकरी एवं चौड़ी33.5 ग्रा.बुवाई के 35 दिन तक
मेट्रीब्यूजिन संकरी एवं चौड़ी250 ग्रा.बुवाई के 35 दिन तक
2, 4 - डी चौड़ी पत्तिया0.4 - 0.5 किग्रा.बुवाई के 35 दिन तक
आइसोप्रोपयूरानसंकर पत्तिया750 ग्रा.बुवाई के 20 दिन तक
आइसोप्रोपयूरान +2, 4 - डीचौड़ी पत्तिया एवं संकरी पत्तिया750 ग्रा +750 ग्रा.बुवाई के 35 दिन तक

गेहूँ के विपुल उत्पादन के लिए मुख्य आवश्यक बातें:-

  • मिट्टी की जांच के बाद उर्वरकों को प्रयोग करें। संतुलित मात्रा में समय पर उर्वरक दें। उर्वरकों का सही प्लेसमेंट उत्पादन बढ़ाने में एवं उर्वरक उपयोग क्षमता बढ़ाने में योगदान देता है। उर्वरको को बीज से 2-3 सेमी नीचे डाले। कार्बनिक एवं जैविक स्रोतों का भरपूर उपयोग करे जिससे मृदा स्वास्थ्य एवं उत्पादकता बढ़ती है।

  • बीजदर अनुशंसित मात्रा में उपयोग करे। क्षेत्र विशेष के अनुसार शुद्ध, स्वस्थ्य, कीट एवं रोग रोधी किस्मों का चयन करें। समय पर बोनी करे। बीज एवं खाद एक साथ मिलाकर बोनी न करें। देर से बुवाई की अवस्था में संसाधन प्रबंधन तकनीक जैसे, जीरो टिलेज का प्रयोग करें। यथासंभव बुवाई लाइनों में करें क्रासिंग न करें। पौध संख्या अनुशंसा से ज्यादा न करें।

  • खरपतवार नियंत्रक उपाय समय पर करें। खरपतवारनाशी दवाओं का इस्तेमाल करते समय ध्यान दे कि फसल में नीदाओं की सघनता एवं नीदाओं के प्रकार के हिसाब से रसायन का चयन करें। खरपतवार नाशी दवा का उपयोग मृदा में पर्याप्त नमी होने की दशा में सही मात्रा एवं घोल का इस्तेमाल करें।

  • गेहूँ  में सिंचाई मिट्टी का प्रकार सिंचाई साधन, सिंचाई उपकरण को ध्यान में रखकर क्रान्तिक अवस्थाओं पर सिंचाई देवे।

  • कीट एवं रोग नियंत्रक उपाय समय पर करें।

  • गेहूँ फसल की कटाई उपरांत नरवई खेतों में न जलायें, नरवई जलाने से खेतों की मृदा में उपलब्ध लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं का ह्रास होता हैं नरवई की आग से लोगों के घरों में भी आग लगती है। एवं जन व पशुधन हानि की भी संभावना रहती है। गेहूँ  की फसल कटाई उपरांत खेतों में समुचित नमी की दशा में रोटावेटर चलाने से नरवई कटकर मिट्टी में मिल जाती है जो कि मृदा के लिए लाभदायक भी है।

  • आज के समय में रसायनों के असंयमित प्रयोग से खेती की उत्पादन लागत बढ़ रही है। आवश्यकता है कि इस उत्पादन लागत को कम किया जाये। उत्पादन लागत को कम करने का सस्ता एवं प्रभावी तरीका है समन्वित प्रबंधन उपायों को अपनाना।

  • मौसम के परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती के बढ़ते तापमान एवं अनिश्चितता के कारण दिन प्रतिदिन कीड़े एवं बीमारियों की समस्या फसलों में बढ़ रही है। इनके प्रभावी प्रबंधन हेतु समन्वित उपायों को अपनाना नितांत आवश्यक है।

  • खेती में उत्पादन प्राप्त करने के लिये समय पर कुशल प्रबंधन एवं सही निर्णय आवश्यक है कई बार किसान भाई खरपतवार नियंत्रक उपायों को देर से अपनाते हैं जिसके कारण खरपतवार फसल की क्रांतिक अवस्था निकल जाती है एवं खरपतवार के पौधे मजबूत हो जाते हैं फिर उनका नियंत्रण रसायनों से भी मुश्किल होता है।


 

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