गेहूं की खेती



गेहूं की खेती







  1. परिचय

  2. कृषि लागत को कम करना

  3. जीरो टिलेज

  4. टर्बो हैप्पी सीडर

  5. किस्म एवं बीज विस्थापन

  6. रोटरी डिस्क ड्रिल

  7. लेजर लैंड लेवलर

  8. उत्पादन बढ़ाना

  9. नई किस्मों के बीजों का प्रयोग

  10. बीज उपचार

  11. सन्तुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग

  12. उन्नत सिंचाई तकनीक

  13. उत्पाद बनाने में सहउद्यमित विकास

  14. बीज उत्पादन में सह उद्यमिता विकास

  15. अपना खेत अपना बीज

  16. बीज अंकुरण की जाँच






परिचय


भारतीय कृषि ने विगत सात दशकों में काफी प्रगति की है और सफलता के इस सफर में कई चुनौतियों आई हैं, जिनका सामना सफलतापूर्वक किया गया है। आज हम खाद्यन्न के उत्पादन में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। कृषि उत्पादन में हम आज विश्व में अग्रणी हैं। एक समय में जहाँ शुरूआती  दौर की सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने की थी, वहीं आज की मुख्य चुनौतियों छोटी जोतों को आर्थिक दृष्टिकोण से मुनाफे के योग्य बनाना, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, सिंचाई जल का समुचित प्रबंधन, युवाओं को कृषि कार्यों की तरफ उन्मुख करना आदि हैं। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा वर्ष 20 22 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने का भागरथी लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चिंतन, मंथन, विवेचना आदि द्वारा उन तमाम स्रोतों का पता लगाया जा रहा है जिनको अपनाकर किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकेंगे।

हमारे देश में विभिन्न प्रकार की कृषि पद्धतियों एवं फसल प्रणालियां हैं, जिनको स्थानीय जलवायु एवं किसानों के पास उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। धान्य फसलों की खेती भारत के लगभग सभी हिस्सों में होती है और यह देश की खाद्यान्न सुरक्षा एव संप्रभूता के लिए अति आवश्यक है। साथ ही किसान परिवारों के रोजमर्रा की खाद्यान्न आवश्यकताओं की पूर्ति भी इसके माध्यम से होती है। लेकिन कालान्तर में कृषि आदानों की कीमतों में वृद्धि और उसके अनुरूप कृषि उत्पादों के मूल्यों में वृद्धि नहीं होने की वजह से कई फसल प्रणालियों से प्राप्त आमदनी लगातार घटती जा रही है। इससे किसान कृषि कार्यों से विमुख होने लगे हैं।

फसल प्रणालियों में धान- गेहूं फसल प्रणाली महत्वपूर्ण है। इस देश की खाद्यान सुरक्षा क्र दृष्टिकोण से हमेशा राष्ट्रीय प्राथमिकता दी जाती रही है। इसको आर्थिक दृष्टिकोण से लाभप्रद और टिकाऊ बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। हाल के वर्षों में धान की कीमतों में उतार चढ़ाव की वजह से यह और कठिन हो गया है आज भारत में धान – गेहूं फसल प्रणाली के अंतर्गत 10 मिलियन हैक्टर क्षेत्रफल आता है। अत: इतने बड़े भू – भाग में अपनाई जाने वाली फसल प्रणाली को मुनाफे का सौदा बनाना और लंबे समय तक बनाये रखना देश हित में बहुत जरूरी है।

अत: इस फसल प्रणाली के अंतर्गत प्रयोग की जाने वाली सभी तकनीकों/विकल्पों पर नए सिरे से विचार कर उनको अधिकाधिक क्षेत्रों में प्रश्रय देना आज की प्राथमिकता है। किसानों की आमदनी बढ़ाने के तीन महत्वपूर्ण पहलू निम्न हैं –

  • उत्पादन लागत को कम करना

  • उत्पादन बढ़ाना

  • समुचित मूल्य मुहैया करवाना


कृषि लागत को कम करना


धान – गेहूं फसल प्रणाली के अंतर्गत उत्पादन लागत को कम करने के लिए कई तकनीकें कारगर हैं, जिनमें जीरो टिलेज, टर्बों हैप्पी सीडर, ररोटरी डिस्क से बिजाई और रोटा\वेटर से गेहूं की बिजाई तथा धान की सीधी बिजाई तकनीकें उल्लेखनीय हैं।

जीरो टिलेज


धान की कटाई के बाद बिना जुताई जीरो टिलेज बीज संग उर्वरक ड्रिल द्वारा गेहूं की बिजाई करने से किसान 3,500 – 4,000 रूपये प्रति एकड़ की बचत कर सकता है। साथ ही मृदा सुधार, पर्यावरण को लाभ के साथ – साथ धन, समय व ईंधन की भी बचत की जा सकती है। यह तकनीक धान की हाथ से कटाई किये गये खेतों में गेहूं की बिजाई के लिए वरदान है उत्तरी एवं पूर्वी भारत में इस तकनीक को अपनाने की अपार संभावनाएं हैं।

टर्बो हैप्पी सीडर


विगत 10 वर्षों में धान की कटाई के लिए कंबाइन का प्रयोग बढ़ा है। ऐसे में धान के खेतों में ही फसल अवशेष काफी मात्रा में खेत में रह जात है, जिससे निजात पाने के लिए किसान उसे जला देते हैं। टर्बो हैप्पी सीडर धान के अवशेष वाले खेतों में बिना जुताई किये गेहूं की बिजाई की एक कारगर तकनीक है। इस तकनीक से न सिर्फ पर्यावरण को बचाया जा सकता है। बल्कि इसका अंगीकरण कर क्विंटल/एकड़ की अतिरिक्त उपज भी प्राप्त होती है। अन्य फायदों में समय, धन श्रम और पानी की भी बचत होती है। खरपतवार का प्रकोप कम होता है तथा फसल कर किसान अपनी आमदनी 15 – 20 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं।

किस्म एवं बीज विस्थापन


कुछ  प्रतिशत किसानों को छोड़ दें तो यह पाया जाता है कि बहुत से किसान अपना ही बीज प्रयोग में लाते हाँ या फिर साथी किसानों से लेकर बुआई करते हैं। यहाँ पर यह जानना अति आवश्यक है कि आप किसी भी स्रोत से बीज खरीदें मगर उसके अंकुरण की जाँच अवश्य करें तभी बीज दर का निर्धारण हो सकेगा। किसान भाई हमेशा नए बीज का प्रयोग में लाया जा सकता है। ऐसा देखने में अक्सर आता है कि नई किस्मों की किल्लत रहती है। ऐसी स्थिति में थोड़ी मात्रा में बीजों की व्यवस्था कर उसे अपने खेत पर लगायें और सही तरीके से फसल की देखभाल करें। साफ – सुथरे बीज उत्पादन के सभी मानकों का पालन कर उत्पादन करें और फिर अगले वर्ष के लिए सुरक्षित स्थान पर भण्डारण करें। अध्ययनों में पाया गया है कि कुल उत्पादन में गुणवत्ता पूर्ण बिज का लगभग 35 प्रतिशत योगदान होता है। अत: बीज की महत्ता को किसानों को समझाकर तथा उन्हें नये किस्म के बीजों के प्रयोग के लिए प्रेरित कर उनकी आमदनी बढ़ाई जा सकती है।

सारणी में विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों में बोने के लिए गेहूं की अनुमोदित किस्मों का विवरण दिया गया है। किसान भाई अपने क्षेत्र के अनुसार दी गई सारणी से किस्मों का चयन कर बिजाई करें।

सारणी 1. विभिन्न उत्पादन क्षेत्रों के लिए गेहूं की नई किस्में













































उत्पादन क्षेत्रसिंचित, समय से बिजाईसिंचित, देर से बिजाईबारानी सीमित सिंचाई समय से बिजाई
उत्तर – पश्चिमी मैदानी क्षेत्रडीबीडब्ल्यू 2, डीबीडब्ल्यू 88, एचडी 3086, डब्ल्यूएच 1105, एचडी 2997डीबीडब्ल्यू 173, डीबीडब्ल्यू 90, डीबीडब्ल्यू 71, डब्ल्यू एच 1124, एचडी 3059, पीबीडब्ल्यू 590

 
एचडी 3043, डब्ल्यूएच 1080, डीबीडब्ल्यू 644
उत्तर – पूर्वी मैदानी क्षेत्रएचडी 2967, एनडब्ल्यू 5054, के 1006, डीबीडब्ल्यू 39, सीबीडब्ल्यू 38, राज 4120 के 307डीबीडब्ल्यू 107, एचडी 3118, एचडी 2985, एचआई 1563, एनडब्ल्यू 2036एचडी 2868, एमएसीएम 6145, के 8027, सी 306
मध्य क्षेत्रचपाती गेहूं : डब्ल्यूएच 1142, एचआई 1544, जीडब्ल्यू 366, जीडब्ल्यू 322, जीडब्ल्यू  273

कठिया गेहूं : एचआई 8737, एचआई 8713, एचआई 1215, एचआई 8498
एमपी 3336, एमपी 1203, एचडी 2932, एचडी 2864, एमपी 4010डीबीडब्ल्यू, 110, एमपी 3288, एमपी 3173, एच आई 1531, एचआई 1500
प्रायद्वीपीय क्षेत्रचपाती गेहूं : एसएसीएस 6478, यूएएस 304, एमएसी एस 6222, एनआईएड डब्ल्यू 917, राज 4037, जीडब्ल्यू 322

कठिया गेहूं : यूएएस 428, डब्ल्यूएचडी 948, यूएएस 415

खपली गेहूं : एमएसीएस 2971, डीडीके 1029, डीडीके 1029 1025
एचडी 3090, एकेएडब्ल्यू 4627, एचडी 2932, राज 4083, एचडी 2833डीबीडब्ल्यू 93, एनआईएडब्ल्यू 1415, एचडी 2887, एचडी 2781, यूएएस 446
उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रसिंचित/ बरानी  समय से बीजाई : एचपीडब्ल्यू 349, एचएस 507, वीएल 907, वीएल 804

अत्यधिक ऊँचे क्षेत्र : वीएल 832, एचएस 375
सीमित सिंचाई पिछेती : एचएस 490, वीएल 892, एचएस 420वर्षा आधारित, जल्दी से बीजाई: एचएस 542, एचपीडब्ल्यू 251, बीएल 829
दक्षिणी पर्वतीय क्षेत्रसीमित सिंचाई, समय से बीजाई चपाती गेहूं एचडब्ल्यू 5216, सीओडब्ल्यू (डब्ल्यू – 1), एचडब्ल्यू 2044

खपली: एचडब्ल्यू 1098
  

 

रोटरी डिस्क ड्रिल


भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान  द्वारा मूलतः विकसित वह तकनीक फसल अवशेषों खासकर धान और गन्ने के फसल अवशेषों में बिना जुताई किये गेहूं की बिजाई की तकनीक है। इस तकनीक के कारगर प्रयोग से जहाँ एक तरफ फसल अवशेष प्रबंधन की समस्या का समाधान किया जा सकता है, वहीँ दूसरी तरफ उत्पादन लागत को भी कम किया जा सकता है। किसानों के खेतों पर लगाये गये सफल परीक्षणों में यह पाया गया है कि गन्ने के रैटून में गेहूं की फसल आसानी से ली सकती है इसकी अतिरिक्त खड़े गन्ने की फसल में मूंग अंतरवर्ती फसल के रूप में उगाई जा सकती है अर्थात् गन्ने के साथ कोई अन्य फसल से किसान को अतिरिक्त आय प्राप्त होगी, यह उसकी आमदनी बढ़ाने में कारगर सिद्ध होगी। ऐसा देखा गया है कि गन्ने के रैटून के साथ किसान कोई भी अंतर्वर्ती फसल नहीं लेते हैं। ऐसे में मूंग, गेहूं आदि को इस मशीन से लगाकर एक बहुत बड़े क्षेत्रफल में इसे फैलाकर किसानों की आमदनी में इजाफा किया जा सकता है।

लेजर लैंड लेवलर


कम्प्यूटर आधारित इस मशीन के द्वारा खेत को समतल बनाया जाता है। हाल के वर्षों में कृषि के क्षेत्र में इस मशीन ने अपनी उपयोगिता सिद्ध की है और आज किसान इसका प्रयोग अपने खेतों में बेझिझक कर रहे हैं। इस मशीन का प्रयोग कर किसान खेत के क्षेत्रफल में इजाफा कर सकता है, साथ ही पानी की भी बचत हो जाती है। खेत समतल होने से कम समय से सिंचाई का कार्य भी संपादित हो जाता है। पानी के समान वितरण होने से सफल के बढ़वार एक समान होती है और उत्पादन भी अधिक मिलता है। संसाधन संरक्षण तकनीकों के प्रयोग से पहले लेजर लैड लेवलर से खेत का समतल होना अति आवश्यक है तभी क्षमता के अनुरूप इन तकनीकों का समुचित दोहन हो पाएगा।

उत्पादन बढ़ाना


उत्पादन बढ़ाना कृषि शोधों का पहला लक्ष्य होता है। पिछले वर्ष गेहूं का रिकार्ड उत्पादन (98.38 मिलियन टन) हुआ और उत्पादकता 3172 किग्रा./हैक्टर रही। उत्पादन को लगातार बढ़ाने की चुनौती देश के कृषि वैज्ञानिकों कृषि विभाग के विस्तार कार्यकर्ताओं और किसानों के समक्ष है। बदलते जलवायु परिवेश में नित नई चुनौतियां दृष्टिगत हो रही है। ऐसे में अत्यधिक उत्पादन देने वाली किस्मों के विकास के साथ – सैट उनमें रोगरोधिता और जैविक व अजैविक तनावों से लड़ने की भरपूर क्षमता का समावेश आज की आवश्यकता बन गई है। अब तनावरोधी किस्मों के विकास पर बल दिया जा रहा है। उत्पादन बढ़ाने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देकर किसान अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं।

नई किस्मों के बीजों का प्रयोग


यह स्वाभाविक है कि नई किस्मों की उपज क्षमता पुरानी किस्मों से अधिक होती है। अत:  नई किस्मों को ही लगाने की सदैव सिफारिश की जाती है। साथ ही उत्पादन स्थिति के हिसाब से ही किस्मों का चयन करना चाहिए। अगेती दशा में बोई जाने वाली किस्मों को अगेती दशा में तथा पिछेती को पिछेती दशा में ही बोना चाहिए। साथ ही अपने क्षेत्र के लिया अनुमोदित किस्में ही लगायें। कई बार देखने में आया है कि किसान भाई ज्यादा उत्साहित होकर दुसरे क्षेत्र की किस्मों को अपने क्षेत्र में लगा देते हैं। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि प्रत्येक उत्पादन क्षेत्र की जलवायु, जाड़े की अवधि तथा फसलों में लगने वाले कीट व बीमारियाँ अलग – अलग होती है। अत: उनके विकास में इन बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है।

बीज उपचार


प्राय: देखा गया है कि किसान भाई बिना उपचार किये ही बिजाई कर देते हैं। कुछ ऐसे रोग है, जो बीज जनित होती है जिसमें कडुवा एक प्रमुख रोग है। अत: इसके लिए समुचित रसायनों का प्रयोग करें। आजकल जैव उर्वरकों से बीज उपचार किया जा रहा है और इसका लाभकारी परिणाम किसान के खेतों पर देखने को मिला है। ये जीवाणु खाद फॉस्फोरस घुलनशील बैक्टीरिया से अवश्य उपचारित करें। इनके प्रयोग मात्र से 5 – 7 प्रतिशत तक की उपज वृद्धि प्राप्त की जा सकती है।

एक हैक्टर खेत के लिए समय से बुआई की दशा में 100 कि. ग्रा. तथा पछेती दशा में 125 किग्रा. बीज का प्रयोग करना चाहिए। बीज दर बढ़ाने से उत्पादन पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है अत: संस्तुत बीज दर के प्रयोग में ही समझदारी है।

सन्तुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग


गेहूं की खेती में उर्वरकों का प्रयोग अति आवश्यक है। फॉस्फोरस और पोटाश खाद बुआई के समय डालनी चाहिए तथा नाइट्रोजन का प्रयोग पहली और दूसरी सिंचाई पर आधी – आधी मात्रा में करना चाहिए। प्रयोगों में यूरिया का सिंचाई से पहले प्रयोग लाभदायक माना गया  है। इस प्रकार हम 5 – 10 प्रतिशत उपज वृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग के लिए ग्रीन सीकर का प्रयोग कर उर्वरकों की उपयोगी दक्षता में सुधार किया जा सकता है। तथा उर्वरक की मात्रा में भी 20 – 25 किग्रा./हैक्टर की बचत भी की जा सकती है। आई. पी. एन. आई. द्वारा विकसित न्यूट्रीएंट एक्सपर्ट सॉफ्टवेयर के माध्यम से प्रत्येक खेत के लिए उर्वरक की मात्रा में निश्चित निर्धारण कर उर्वरक की मात्रा का निश्चित निर्धारण कर उर्वरक की मात्रा में बचत की जा सकती है। साथ ही समेकित उर्वरक प्रबंधन के सिद्धांत को अपनाकर पोषण के विभिन्न स्रोतों का उपयोग कर आपूर्ति करना आवश्यक है। इसमें गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट, हरी एवं भूरी खाद के साथ रासायनिक उर्वरकों का समायोजन कर मृदा की सेहत में सुधार कर उत्पादन में वृद्धि की जासकती है।

उन्नत सिंचाई तकनीक


सिंचाई के क्षेत्र में भी कई नूतन प्रयोग हुए हैं। अच्छादित सिंचाई (फ्लड इरिगेशन) की तुलना में फव्वारा विधि अधिक कारगर पाई गई हैं। शोधों से पता चला है कि फव्वारा विधि से सिंचाई जल की बचत तो होती ही है साथ ही उत्पादन में भी वृद्धि होती है। भारत सरकार द्वारा द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की परिकल्पना ‘प्रति बूँद से अधिक उपज को सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की परिकल्पना प्रति  बूँद से अधिक उपज को साकार करने के लिए किसान भाई अपने खेतों में फव्वारा विधि को अपना सकते हैं और इसमें सरकार काफी अनुदान भी दे रही है। सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में तो यह तकनीक एक वरदान है। जहाँ परंपरागत सिंचाई में जल उपयोग दक्षता 30 – 40 प्रतिशत है, वहीं सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों में यह 80 – 90  प्रतिशत है।

उत्पाद बनाने में सहउद्यमित विकास


कृषि में मूल्य संवर्धन द्वारा आमदनी बढ़ाने की असीम संभावनाएं हैं। इस दिशा में संस्थान में स्थित गुणवत्ता प्रयोगशाला में सहउद्यमियों को गेहूं के विभिन्न उत्पाद जैसे – सूजी, दलिया, मैक्रोनी, पास्ता आदि बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इच्छुक किसान, महिलाएं एवं ग्रामीण/शहरी नवयुवक प्रशिक्षण प्राप्त कर इसे लघु उद्योग के रूप में अपना सकते हैं कम लागत से इस कार्य की शुरूआत कर आमदनी के नये स्रोत के रूप में यह कार्य फायदेमंद हो सकता है। आज आर्गेनिक उत्पादों की बाजार में बहुत मांग है। अत: आर्गेनिक गेहूं से इस उत्पादों को बनाकर और अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है।

बीज उत्पादन में सह उद्यमिता विकास


गेहूं की सामान्य खेती की तुलना में बीज उत्पादन हमेशा लाभदायक होता है, जिससे लगभग 20 – 25 प्रतिशत अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। यदि किसान बड़े पैमाने पर इस कार्य में नहीं लगना चाहता है तो वह कम से कम अपने लिए या फिर अपने साथ किसानों के लिए छोटे पैमाने पर भी बीज उत्पादन कर अपनी आमदनी बढ़ा सकता है।

अपना खेत अपना बीज


गेहूं की खेती करने वाले किसानों के लिए बीज उत्पादन में क्षमता विकास अति आवश्यक है। बिजाई से पूर्व सभी किसान नयी प्रजातियों का बीज खरीदने के लिए विभिन्न संस्थानों के चक्कर काटते रहते हैं और उनको वांछित किस्म का बीज नहीं मिल पाता है। इसी परेशानी को ध्यान में रखकर हमारे संस्थान ने अपना खेत अपना बीज कार्यक्रम का सूत्रपात किया है, जिसके माध्यम से किसानों को प्रशिक्षित कर गेहूं का बीज उत्पादन किया जा रहा है। इसमें महिला किसानों का भी जोड़ा गया है। साथ ही प्रगतिशील किसानों के खेतों पर बीज उत्पादन का कार्य भी संस्थान संपादित कर रहा है। इससे किसान अपने खेत के लिए बीज का उत्पादन कर सकता है और मुनाफा कमा सकता है और इस प्रकार प्रत्येक वर्ष बीज खरीदने पर होने वाले अतिरिक्त खर्च की बचत हो जाती है। इस कार्य में किसानों का बीज उत्पादक समूह बनाकर उसका पंजीकरण करवाकर एक बीज कंपनी की स्थापना भी की जा सकती है और किसानों को एक आम किसान से सहउद्यमी या व्यापारी बनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। बाजार में उनका एक ब्रांड स्थापित किया जा सकता है। इससे एक तरफ मुनाफा होगा वहीं दूसरी तरफ अच्छी गुणवत्ता का बीज भी उनको उपलब्ध होगा।

बीज अंकुरण की जाँच


बीजाई से पूर्व अंकुरण की जाँच अवश्य करें, जो किसान अपना बीज या साथी किसान द्वारा दिए गये बीज का प्रयोग करते हैं, उनके अंकुरण की जाँच आवश्यक है। विश्वसनीय स्रोतों जैसे राष्ट्रीय बीज निगम, राज्य कृषि फार्म, राज्य कृषि फार्म, कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्  के संस्थान आदि से बीज खरीदने पर अंकुरण की जाँच की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ता है। क्योंकि ये संस्थाएं अंकुरण जांचने के पश्चात ही बीज की बिक्री करती हैं। अंकुरण की जाँच के लिए जूट की बोरी को पानी से गीला कर छाया में बिछा दें। फिर गेहूं के 100 दाने उस बोरी पर डाल देते हैं। एक दूसरी बोरी को मिलाकर ऊपर से ढक देते हैं। तीन – चार दिन बाद ऊपर वाली बोरी को हटाकर बिना अंकुरित दानों को गिन लेते हैं। इस प्रकार अंकुरण प्रतिशत का निर्धारण कर बीज की मात्रा की वास्तविक गणना करते हैं तथा बिजाई करते हैं।


 

3 Comments

  1. […] किलोग्राम बीज की दर से शोधित करके बोगेहूं की खेतीना […]

    ReplyDelete

Post a Comment

Previous Post Next Post